वो गेस्ट हाउस कांड, जिसने मायावती और मुलायम को दुश्मन बना दिया

”जिस तरह से तूफ़ान आने पर सांप और छछुंदर एक साथ आ जाते हैं, वैसे ही सपा और बसपा राजनीतिक रूप से साफ़ हो जाने के बाद एक-दूसरे के साथ आ गए हैं.”

गेस्ट हाउस कांड है क्या?

सपा और बसपा ने 256 और 164 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ा. सपा अपने खाते में से 109 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि 67 सीटों पर हाथी का दांव चला. लेकिन दोनों की ये रिश्तेदारी ज़्यादा दिन नहीं चली.

साल 1995 की गर्मियां दोनों दलों के रिश्ते ख़त्म करने का वक़्त लाईं. इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है. इस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई.

भाजपा, मायावती के लिए सहारा बनकर आई और कुछ ही दिनों में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोहरा को वो चिट्ठी सौंप दी गई कि अगर बसपा सरकार बनाने का दावा पेश करती है तो भाजपा का साथ है.

वरिष्ठ पत्रकार और उस रोज़ इस गेस्ट हाउस के बाहर मौजूद रहे शरत प्रधान ने बताया कि वो दौर था जब मुलायम यादव की सरकार थी और बसपा ने समर्थन किया था लेकिन वो सरकार में शामिल नहीं हुई थी.

साल भर ये गठबंधन चला और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की ख़बरें आईं जिसका ख़ुलासा आगे चलकर हुआ. कुछ ही वक़्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया.

उन्होंने कहा, ”इस फैसले के बाद मायावती ने गेस्ट हाउस में अपने विधायकों की बैठक बुलाई थी. सपा के लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल गई कि बसपा और भाजपा की सांठ-गांठ हो गई है और वो सपा का दामन छोड़ने वाली है.”

प्रधान ने कहा, ”जानकारी मिलने के बाद बड़ी संख्या में सपा के लोग गेस्ट हाउस के बाहर जुट गए. और कुछ ही देर में गेस्ट हाउस के भीतर के कमरे में जहां बैठक चल रही थी, वहां मौजूद बसपा के लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया. ये सब हमने अपनी आंख़ों से देखा है.”

”तभी मायावती जल्दी से जाकर एक कमरे में छिप गईं और अंदर से बंद कर लिया. उनके साथ दो लोग और भी थे. इनमें एक सिकंदर रिज़वी थे. वो ज़माना पेजर का हुआ करता था. रिज़वी ने मुझे बाद में बताया कि पेजर पर ये सूचना दी गई थी कि किसी भी हालत में दरवाज़ा मत खोलना.”

”दरवाज़ा पीटा जा रहा था और बसपा के कई लोगों की काफ़ी पिटाई. इनमें से कुछ लहूलुहान हुए और कुछ भागने में कामयाब रहे. ”

गेस्ट हाउस कांड

प्रधान के मुताबिक तब बसपा के नेता सूबे के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फ़ोन कर बुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तब किसी ने फ़ोन नहीं उठाया.

”इस बीच मायावती जिस कमरे में छिपी थीं, सपा के लोग उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और बचने के लिए भीतर मौजूद लोगों ने दरवाज़े के साथ सोफ़े और मेज़ लगा दिए थे ताकि चटकनी टूटने के बावजूद दरवाज़ा खुल न सके.”

वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में खेले गए इस सियासी ड्रामे के तार दिल्ली से जोड़ते हैं. उनका कहना है कि साल 1992 में जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई, तो काफ़ी झटका लगा था. उसके बाद 1993 में सपा-बसपा ने भाजपा को रोकने के लिए हाथ मिलाने का फ़ैसला किया और अपनी पहली साझा सरकार बनाई. मुलायम मुख्यमंत्री बने.

उस वक़्त दिल्ली में नरसिम्हा सरकार थी और भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे. दिल्ली में इस बात की फ़िक्र होने लगी थी कि अगर लखनऊ में ये साझेदारी टिक गई तो आगे काफ़ी दिक्कतें हो सकती हैं.

इसलिए भाजपा की तरफ़ से बसपा को पेशकश की गई कि वो सपा से रिश्ता तोड़ लें तो भाजपा के समर्थन से उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल सकता है.

”मुलायम को इस बात का अनुमान हो गया था और वो चाहते थे कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौक़ा दिया जाए. लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया.”

‘इसी खींचतान के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के लिए बसपा ने सभी को स्टेट गेस्ट हाउस में जुटाया था और मायावती भी वहीं पर थीं. तभी सपा के लोग नारेबाज़ी करते हुए वहीं पहुंच गए थे.”

बसपा का आरोप है कि सपा के लोगों ने तब मायावती को धक्का दिया और मुक़दमा ये लिखाया गया कि वो लोग उन्हें जान से मारना चाहते थे. इसी कांड को गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है.

ऐसा भी कहा जाता है कि भाजपा के लोग मायावती को बचाने वहां पहुंचे थे लेकिन शरत प्रधान का कहना है कि इन दावों में दम नहीं है कि भाजपा के लोग मायावती और उनके साथियों को बचाने के लिए वहां पहुंचे थे.

उन्होंने कहा, ”मायवती के बचने की वजह मीडिया थी. उस वक़्त गेस्ट हाउस के बाहर बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद थे. सपा के लोग वहां से मीडिया को हटाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन ऐसा हो न सका.”

”कुछ ऐसे लोग भी सपा की तरफ़ से भेजे गए थे जो समझाकर मायावती से दरवाज़ा खुलवा सके, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.”

इसके अगले रोज़ भाजपा के लोग राज्यपाल के पास पहुंच गए थे कि वो बसपा का साथ देंगे सरकार बनाने के लिए. और तब कांशीराम ने मायावती को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया. और यहीं से मायावती ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू कीं.

क्या मायावती ने कभी खुलकर इस दिन के बारे में बताया कि असल में उस दिन क्या हुआ था, प्रधान ने कहा, ”जी हां, कई बार. मुझे दिए इंटरव्यू में या फिर प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने ख़ुद कहा कि उनका ये स्पष्ट मानना है कि उन्हें उस दिन मरवाने की साज़िश थी जिससे बसपा को ख़त्म कर दिया जाए.”

”मायावती को सपा से इतनी नफ़रत इसलिए हो गई क्योंकि उनका मानना है कि गेस्ट हाउस में उस रोज़ जो कुछ हुआ, वो उनकी जान लेने की साज़िश थी. ”

तो क्या फूलपुर और गोरखपुर में जो हो रहा है, वो इस दुश्मनी को ख़त्म करने की कोशिश नहीं है, प्रधान ने कहा, ”मुझे नहीं लगता. ये शॉर्ट टर्म के लिए हो सकता है लेकिन लंबी मियाद के लिए नहीं.”

”मायावती काफ़ी चतुर नेता हैं और अपने फ़ायदे को सर्वोपरि रखती हैं. अखिलेश यादव को भी इस तरह के गुर सीखने में अभी वक़्त लगेगा.’

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